निदेशालय की गतिविधियां

भूतत्व सर्वेक्षण एवं खनिज पूर्वेक्षण:

वर्तमान कार्य:

निदेशालय के वर्तमान क्षेत्र की अन्वेषण गतिविधियों का निम्न बिंदुओं में विवरण किया गया है:

  • निर्धारित खनिज क्षेत्र की क्षमता का आकलन करने हेतु प्राथमिक सर्वेक्षण निष्पादित किया गया।
  • अनछुए क्षेत्रों में धातु एवं गैर-धातु के नए खनन का आकलन करने हेतु प्राथमिक एवं क्षेत्रीय सर्वेक्षणों का आकलन किया गया।
  • निदेशालय की प्रचार संबंधी गतिविधियों के तौर पर निर्धारित खनिज समाग्री के ग्रेड-वार रिजर्व को अवरुद्ध करने के लिए विस्तृत सर्वेक्षण एवं सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के उद्योगों पर लागत के आधार पर समान संविदात्मक कार्य किए गए।
  • सरकार की आवश्यकताओं के आधार पर विस्तृत सर्वेक्षण निष्पादित किया जा रहा है।

1955-70 के दौरान विकास:

प्रारंभ में, भूतत्व सर्वेक्षण भारत द्वारा चिन्हित विभिन्न आधारों पर निदेशालय ने प्राथमिक जांच किया एवं खनिज भाण्डरण हेतु खोज शुरु की। राज्य स्तर पर नीति उन्मुखीकरण निर्धारित औद्योगिक अथवा गैर-धातु घनिज बेल्ट का अन्वेषण करना था, जिसका लक्ष्य यह था कि राज्य में इन भण्डारणों के विकास से त्वरित परिणाम प्राप्त हो सकें। अतः इस बात पर बल दिया जा रहा था कि प्राथमिक पूर्व सर्वेक्षण की सहायता से सुगमता से प्राप्त होने वाले भण्डारणों जैसे क्ले, लाइमस्टोन, डोलोमाइट, जिप्सम, मैग्नेसाइट आदि को चिन्हित किया जा सके एवं उनका विकास किया जा सके। प्राथमिक सर्वेक्षण विस्तृत मैपिंग एवं सैंपलिंग के आधार पर निष्पादित किए जा रहे थे एवं तत्पश्चात व्यावसायिक अन्वेषणों हेतु भंडारों को भरने की प्रक्रिया हेतु ड्रिलिंग कार्य शुरु किया गया।

1970-80 के दौरान गतिविधियां:

जैसे-जैसे काम करने की कुशलता एवं विश्वास बढ़ा, अन्वेषण प्रक्रियाओं का विविधिकरण हुआ एवं धातु भाण्डारों को चिन्हित करने हेतु विभिन्न जटिल समस्याएं जो अधिक अन्वेषण समय/जोखिम भरी थीं उन्हे प्राथिमिकता दी गई। इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रमों की सहयाता से जियोसाइंस के विभिन्न क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकी, उपकरणों एवं विशषेज्ञों को प्राप्त किया गया, अनछुए क्षेत्रों में अन्वेषण गतिविधियों को क्रियान्वित किया गया, जहां प्राथमिक डाटा भौतिक रूप से गैर-मौजूद था। अब खनिज अन्वेषण प्रक्रिया मूल रूप से अज्ञातों के लिए खोज का विषय बन गया था। क्योंकि आसानी से चिन्हित किए जाने वाले लक्ष्य खत्म हो रहे थे, अतः “कॉंसेप्ट उन्मुख” कार्यक्रमों को अधिक जोर दिया गया, जिसमे मानव संसाधन, सामग्री एवं समय की अधिक खपत की मांग थी। इस नीति के आधार पर कार्य करने के बेहतर परिणाम प्राप्त हुए। अलमोड़ा जिले एवं चमौली के विभिन्न हिस्सों में क्वार्ट्ज-सेरिसाइट शिस्ट्स से संबद्ध शीलाइट का खनन, देहरादून जिले में क्रोल निर्माण के साथ लेड एवं ज़िंक खनन एवं जिला देहरादून/गढ़वाल में शिवालिक निर्माण के साथ यूरेनियम एवं आसपास के क्षेत्रों को चिन्हित किया गया एवं खनिजों की खोज के लिए निदेशालय द्वारा कार्य को जारी रखा गया।

1980-1990 के दौरान गतिविधियां:

इन वर्षों के दौरान अधिकांश कार्यक्रम जिन्हे निष्पादित किया गया वे या तो पूर्व के दशक में आरंभ किए गए थे और उन्हे जारी रखा गया अथवा आधुनिक तकनीक से फॉलो अप के परिणाम प्राप्त हुए अथवा पूर्व कार्यक्रमों को विस्तृत किया गया। राज्य में नए खनिज आधारित उद्योग को स्थापित करने एवं खनिज उत्पादन, नए खान/खनिज भण्डारण के विकास का विस्तार करने पर अधिक जोर दिया जाने लगा। स्ट्रीम सेडीमेंट जियोकेमिकल सर्वक्षण, जियोफिजिकल सर्वेक्षण, मिनरलॉजिकल सर्वेक्षण के साथ क्षेत्रीय सर्वेक्षण के आधार पर नए खनिज स्थलों की खोज को शुरु किया गया। साथ ही गुणवत्ता का पता लगाने की प्रक्रिया एवं उच्च स्तरीय खनिज के भण्डारण में कार्य कुशलता बढ़ती गई जिसका लक्ष्य परियोजना का विकास था।

इस काल के दौरान गुणवत्ता एवं रिजर्व हेतु विभिन्न भण्डारणों का आकलन किया गया। इनमे सीमेंट ग्रेड लाइमस्टोन, डोलोमाइट, मैगनेसाइट एवं सोपस्टोन, प्रोफइलाइट एवं डाय्सपोर, रॉक फॉस्फोट, सिलिका सैंड, चाइना क्ले, मार्ल एवं कंकड़ के भण्डारण सम्मिलित हैं। विभिन्न खनन पर अन्वेषण का कार्य जारी रखा गया। इन्हें खनिज भण्डारण के रूप में परिवर्तित करने के उद्देश्य से इनके कार्य का अनुश्रवण करने हेतु विशेष रूप से कॉपर, लेड, ज़िंक, टिन, टंग्सटन, प्लेसर गोल्ड आदि के खनन के कार्य। इसके अतिरिक्त बुंदेलखंड में एवं तराई बेल्ट के कुल क्षेत्र में डायमेंशनल पत्थर की खोज में जांच को निष्पादित किया गया। स्ट्रीम सेडीमेंट के पैंड कंसंट्रेट को एकत्र करने के दौरान ललितपुर एवं सोनभद्र के विभिन्न स्थलों में सोने की मौजूदगी देखी गई, जिन पर बाद में फॉलो-अप कार्य किए गए।

वर्ष 1990-2000 के दौरान खनिज भण्डारणों एवं ज्ञात खनन के आकलन के कार्य को निष्पादित किया गया, एवं समानांतर रूप से नए क्षेत्रों के खनन की खोज भी जारी रखी गई। इन वर्षों के दौरान सोना खनन के नए क्षेत्रों की खोज की गई। मदौरा, ललितपुर के अल्ट्राबेसिक रॉक में धातु के प्लेटिनम ग्रुप की मौजूदगी देखी गई एवं संभावित क्षेत्रों में हीरे की खोज को जारी रखा गया। इसके साथ ही सिलेमनाइट खनन के आकलन का कार्य भी किया जा रहा था।

इसके बाद के वर्षों में, पूर्व में शुरु की गई जांच को जारी रखा गया। इसके बाद राज्य में जियोलॉजिकल वातावरण पर विभिन्न अध्ययन किए गए, जिससे खनिज संबद्धों को चिन्हित किया जा सके एवं वैज्ञानिक मॉडल पर आधारित संभावनाओं का आकलन किया गया एवं तत्पश्चात विस्तृत अन्वेषण किया गया।