मुख्य खनिज

मुख्य खनिज

प्रदेश में खनिज दोहन हेतु की गई भूगर्भीय जांच व इस कार्य में रत सभी अनुभागों के संयुक्त प्रयासों की संलिप्तता के परिणामस्वरूप, आर्थिक एवं औद्योगिक महत्त्व के अनेकों खनिज भंडारों को वर्गीकृत किया गया और उन्हें उनके औद्योगिक प्रयोगों के अनुसार वर्णित किया गया |

सीमेंट उद्योग

सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर, शेल व जिप्सम सीमेंट उद्योग के लिए वांछित कच्चा माल हैं | प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में लगभग 430 मिलियन टन सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर के भंडार आँके गए हैं | इन भंडारों के साथ साथ अथवा निकटवर्ती भागों में शेल के भंडारण भी सामान्यतः पाए जाते हैं |

लगभग 175 मिलियन टन सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर का भंडार सोनभद्र जनपद में, कोटा से बिल्ली की ओर सोन नदी के दक्षिण में 20 किमी में फैली कजराहट बेल्ट में आंकलित है | डाला में स्थित सीमेंट फैक्ट्रियाँ इन्हीं भंडारों पर आश्रित हैं |

निंघा पहाड़ियों में, सोनभद्र जनपद में ओबरा के दक्षिण में लगभग 10.19 मिलियन टन क्रिस्टलीय संगमरमर पत्थरों का विशाल भंडार है | यह भंडारण उच्च कैल्शियम एवं निम्न सिलिका पदार्थ से युक्त है तथा कजराहट एवं रोहतास बेल्ट्स के निम्न ग्रेड खनिजों के साथ एक बेहतर मिश्रण सामग्री के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है |

जिप्सम

जिप्सम को सीमेंट उद्योग में कठोरता नियंत्रक के रूप में प्रयोग किया जाता है, अभी तक हमारे प्रदेश में बहुत कम मात्रा में पाया गया है | पौड़ी जनपद में लक्ष्मण झूला के निकट जो संभावित क्षेत्र पाये गए थे , पूर्व में इन स्थानों का दोहन कर लिया गया है परंतु चूंकि भंडार जंगलों में स्थित हैं इसलिए वहाँ खदानें बंद हो चुकी हैं | पौड़ी जनपद में लक्ष्मण झूला स्थित निहाल घाटी में कई क्षेत्र इन खनिजों के लिए जाने जाते हैं परंतु ऐसे क्षेत्र छिटपुट हैं तथा यहाँ खदान की स्थितियाँ बहुत ही दयनीय हैं |

शेल

सीमेंट उत्पादन हेतु निम्न सिलिका एल्यूमिनियम शेल एक एडिटिव के तौर पर उचित पदार्थ माने जाते हैं, इनका भंडारण लगभग सभी सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर क्षेत्रों में होता है और ये प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं |

अग्नि रोधक उद्योग

खनिज, जो अम्ल एवं आधारभूत अग्निरोधक के तौर पर प्रयोग किए जाते हैं, यथा मैग्नेसाइट, डोलोमाइट, पाइरोफिलाइट, डाइस्पोर , क्वार्टज़ाइट,ग्रेफ़ाइट,मिट्टियाँ, अंडालुसाइट एवं सिल्लीमनाइट इत्यादि, प्रदेश के विभिन्न भागों में पाये जाते हैं |

फ़ायर क्ले

निम्न पी.सी.ई. वाला लगभग 3 मिलियन टन का फ़ायर क्ले का भंडार सोनभद्र जनपद के दक्षिणी पश्चिमी भाग में स्थित बांसी-मिश्रा –मकड़ीखोह क्षेत्र में आंकलित किया गया है | इन फ़ायर क्लेज़ का परीक्षण सी.जी.सी.आर.आई. प्रयोगशालाओं में किया गया तथा ये पाया गया कि यह खनिज अपनी नॉन-प्लास्टिक प्रकृति तथा उच्च संरंध्रता के कारण एकल रूप में किसी भी औद्योगिक कार्य हेतु उचित नहीं है | इन मिट्टियों से, उचित प्लास्टिक क्ले के सम्मिश्रण के बाद, आई.एस.:6 स्तरीय फ़ायर ब्रिक्स बनाई जा सकती हैं | बाद में, बांदा/चित्रकूट जनपदों के कारवी-मानिकपुर क्षेत्र में फ़ायर क्ले के कुछ और क्षेत्र पाए गए | इस मिट्टी की तह 2 से 6 मीटर तक मोटी है और बाक्साइट से युक्त है |

डायसपोर

झांसी, ललितपुर और हमीरपुर जनपद के बहुत से क्षेत्रों में डायसपोर पाइरोफ़िलाइट के साथ पाया जाता है | आमतौर पर 4 से 10% डायसपोर पाइरोफ़िलाइट में होता है| बहुत से क्षेत्र निजी हाथों में पट्टे पर दिये गए हैं तथा खनिज बहुत से उद्योगों में सप्लाई किया गया है |

एंडालुसाइट

एंडालुसाइट फिलाइट और शिस्ट में पोर्फ़ायरोब्लास्ट्स के रूप में होता है (1-2 सेमी लंबा और 3-5 सेमी चौड़ा), जबकि प्लेसर मिगमाटाइट्ज़ और क्वार्ट्ज़ की तहों में फिलाइट के ऊपर फैला होता है, इस प्रकार की खनिज संपदा सोनभद्र जनपद के उत्तर पश्चिम में स्थित विधमगंज में 48 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैली हुई है | फिलाइट में पाये जाने वाले एंडालुसाइट की उपस्थिति 5% से लेकर 15% के बीच होती है तथा इस सामग्री में 46-55% सिलिका, 32-39% एलुमिना, 3.5-4.7% आइरन आक्साइड, 0.3-0.6% TiO2, लगभग 0.5% सीएओ, लगभग 0.6% Na2O, 3.3% K2O तथा 2.9 – 4.2% तक लास ऑन इग्नीशन पाया जाता है |

इस क्षेत्र में संभावित है कि चट्टानों की प्रति मीटर गहराई में 13.5 मिलियन एंडालुसाइट हों व 1.5 वर्ग किमी में फैले हुए प्लेसर भंडार में 1 मिलियन टन एंडालुसाइट धरती से 4.24 मीटर की गहराई पर हों | इतनी अधिक मात्रा में लौह की उपलब्धता के कारण खनिज को अग्निरोधक उद्योगों में प्रयोग किया जा सकने से पूर्व उन्नयन एवं लाभकारी होने की प्रक्रिया में लाना होगा |

सिल्लीमैनाइट

सिल्लीमैनाइट प्रोर्फ़ायरोब्लास्ट्स की तरह लंबे सांक्षेत्रिक स्फटिकों के रूप में होता है (0.5 से लेकर 17 सेमी तक) | दक्षिण सोनभद्र में स्थित, बभनी के निकट छिपिया क्षेत्र में 100 मीटर चौड़ाई में फैली क्वार्ट्ज़ – बायोटाइट शिस्ट चट्टानों के कुल भार का 15% सिल्लीमैनाइट से निर्मित है |

सिल्लीमैनाइट का खनन योग्य भंडार 30 मीटर की गहराई तक लगभग 10 मिलियन टन तक आंकलित किया गया है, जिसमें से 1 मिलियन टन (प्रमाणित भंडार) 0.5 किमी की लंबाई में फैला है जिसमें सम्मिलित है 21.46% ए.आई. 203, 6.6% एफ.ई.203 एवं 61.0% सिलिका (ए.आई.203 का मान 10% बढ़ जाता है जब सिल्लीमैनाइट स्फटिकों को अलग से विश्लेषित किया जाता है ) | इतनी अधिक मात्रा में लौह की उपलब्धता के कारण खनिज को उन्नयन एवं लाभकारी होने की प्रक्रिया में लाना होगा इससे पूर्व कि उसे अग्निरोधक उद्योगों में प्रयोग किया जाए |

काँच उद्योग

विभिन्न प्रकार के काँच तैयार करने के लिये उच्च ग्रेड वाली सिलिका मिट्टी आधारभूत कच्चा माल है | वर्तमान में भुरभुरा, उच्च कोटि का माल शंकरगढ़, प्रयागराज जनपद के पास निजी पार्टियों द्वारा खनित किया जाता है और तमाम ग्लास फैक्ट्रियों व ढलाई इकाइयों में भेजा जाता है (ढलाई वाली मिट्टी के तौर पर) | इस क्षेत्र में एक ग्लास निर्माता कंपनी भी कार्यरत है | प्रयागराज जनपद और निकटवर्ती चित्रकूट के कई हिस्सों में सम्पन्न हुई भूगर्भीय खोज के परिणामस्वरूप बहुत से बड़े छोटे आकार के काँच भंडारों का पता चला है | इन क्षेत्रों में विभिन्न ग्रेडों के कम्पेक्ट बलुआ पत्थरों के बड़े भंडार भी मौजूद हैं | राज्य खनिज विकास निगम ने अपनी खदानें एवं एक लाभकारी प्लांट, मध्यम ग्रेड की सामग्री को अपग्रेड करने के लिए लगाया है जो कि वर्तमान समय में मेसर्स एन.एम.डी.सी. द्वारा संचालित किया जा रहा है |

एल्यूमिनियम उद्योग

एल्यूमिनियम उद्योग बाक्साइट, उच्च एलुमिना मिट्टी और डाइसपोर आदि का प्रयोग एल्यूमिनियम धातु के निर्माण के लिए कच्चे माल की तरह करता है | जनपद बांदा, मिर्जापुर और वाराणसी/चंदौली में की गई जाँचों के परिणामस्वरूप उच्च ग्रेड के अल्यूमिना भंडार रझौन, माणिकपुर के दक्षिण में पाए गए हैं | 12 मिलियन टन बाक्साइट में से 6 लाख मिलियन टन भंडार उच्च ग्रेड एलुमिना (>45%) वाले हैं जो एल्यूमिनियम उद्योग के लिए अनुकूल हैं | पूर्व में रझौन भंडार के एक भाग का खनन किया गया था तथा प्राप्त खनिज को हिनदालको, सोनभद्र (उ.प्र.) एवं कोरवा (म.प्र.) भेजा गया था | वाराणसी/चंदौली में 1.5 मिलियन टन (जी.एस.आई.)के भंडारों का आंकलन हुआ है |

उर्वरक उद्योग

उर्वरक उद्योग के लिए नाइट्रोजन, पोटाश एवं फास्फेट आधारभूत तत्व हैं जो आम तौर पर प्रकृतिक रूप से संग्रहीत खनिज होते हैं | इसके अतिरिक्त बहुत प्रकार के मृदा अनुकूलक जैसे जिप्सम, चूना पत्थर, पाइराइट इत्यादि भी वांछित होते हैं | फास्फेटिक चट्टानों का जमाव, जिप्सम और चूना पत्थरों के भंडार प्रदेश में अनेकों स्थानों पर उपलब्ध हैं |

फास्फेटिक चट्टानें

निदेशालय ने ललितपुर जनपद के पिसनारी – तोरी क्षेत्र की 6 किमी लंबी बेल्ट में फास्फेटिक चट्टानों का एक विस्तृत अन्वेषण करवाया है | इन भंडारों में पाए जाने वाले खनिज में पी-205 सामग्री की मात्रा 5% से 36% के बीच है | इन्हीं भंडारों में लगभग 6 मिलियन टन का 16% पी-205 क्षमता से युक्त खनन योग्य भंडार भी आंकलित किया गया है | उत्तर प्रदेश राज्य खनिज विकास निगम ने इन भंडारों का दोहन करवाया और ऐसे कच्चे खनिज पदार्थ को बेचा जिसमें पी-205 सामग्री की मात्रा 25% से अधिक थी | यह खनिज एलीमेंटल फ़ासफोरस बनाने और प्रत्यक्ष उर्वरक बनाने में काम आता है | 3 मिलियन टन के निम्न ग्रेड चट्टान भंडार का खनन व उसे लाभान्वित कर उससे वार्षिक 1,20,000 मिलियन टन उच्च ग्रेड का फ़ास्फ़ेट बनाने के लिए, (जिसमें पी-205 की मात्रा 36% से अधिक हो) इन भंडारों के दोहन हेतु 70 करोड़ रूपये की लागत से एक समेकित परियोजना विकसित की गई है |

निर्माण उद्योग

सीमेंट के अतिरिक्त, निर्माण उद्योग में विभिन्न प्रकार की चट्टानें और उनसे बने उत्पाद प्रयोग में लाये जाते हैं जैसे बिल्डिंग स्टोन, संगमरमर, गिट्टी, लाल मिट्टी, ईंट हेतु मिट्टी, फ़िलर, पेंट एक्सटेंडर एवं चूना इत्यादि | बुंदेलखंड का ग्रेनाइट तथा विंध्याचल का बलुआ पत्थर बिल्डिंग स्टोन एवं गिट्टी के लिए सर्वथा श्रेष्ठ है | छत के लिए स्लेटें बहुत से पहाड़ी जनपदों से मँगवाई जाती हैं | लाल मिट्टी तथा बजरी मैदानी भागों में स्थित लगभग प्रत्येक नदी ताल से प्राप्त की जाती है | ईंट भट्ठे प्रदेश के मैदानी भागों में लगभग हर जगह मौजूद हैं और ईंट की मिट्टी इन भट्ठों के समीप पाये जाने वाली भूमि से ली जाती है | चूना बनाने के लिए निम्न ग्रेड चूना पत्थर एवं डोलोमाइट का खनन सोनभद्र की खदानों से किया जाता रहा है | विभिन्न प्रकार के पेंट्स निर्माण कार्य में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं | पाइरोफिलाइट, ओक्रे तथा अन्य बहुत से खनिज उच्च कोटि के पेंट्स का आधार बनाने के लिए वांछित हैं | पाइरोफिलाइट के भंडार झांसी, ललितपुर एवं हमीरपुर जनपदों में पाए जाते हैं जबकि ओक्रे बांदा/चित्रकूट जनपदों में पाया जाता है |

विविध उद्योग

बहुत से ऐसे बड़े एवं छोटे उद्योग हैं जिनमें खनिजों का एक या एक से अधिक रूपों में प्रयोग किया जाता है जैसे इलेक्ट्रानिक्स, केमिकल, रबर, कागज़, फिलर, कॉसमेटिक, इस्पात ढलाई इत्यादि | इन उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले खनिज प्रदेश में उपलब्ध हैं | इस प्रकार के खनिजों का एक संक्षिप्त निरूपण निम्नलिखित है :-

  • एस.एम.एस. ग्रेड डोलोमाइट :- निदेशालय द्वारा सोनभद्र जनपद के बारी – बागमन , सिंदूरिया , चोपन एवं कर्मदंड क्षेत्रों में एस.एम.एस. ग्रेड डोलोमाइट की उपस्थित का भूगर्भीय अन्वेषण कराया गया है | इस्पात ढलाई उद्योग के लिए उपयुक्त 6.5 मिलियन टन क्षमता का भंडार चिन्हित किया हैं |
  • पाइरोफिलाइट डाइसपोर के साथ ललितपुर, झांसी एवं हमीरपुर जनपदों के कुछ निश्चित भूगर्भीय क्षेत्रों में पाया जाता है | अयस्क में 4% से 10% तक डाइसपोर की उपलब्धता रहती है | बहुत से निजी उद्यमी इस क्षेत्रों में खनन कर रहे हैं और उन्होने इन खनिजों पर आधारित छोटे उद्योगों की स्थापना भी की है | भूगर्भीय कार्यों के परिणामस्वरूप यह सामने आया है कि ललितपुर जनपद में तीन क्षेत्र और हमीरपुर जनपद में एक क्षेत्र में लगभग 0.5 मिलियन टन के पाइरोफिलाइट के भंडार मौजूद हैं |
  • बेराइट - साबुत या पिसा बेराइट मुख्य रूप से तेल के कुओं की खुदाई, काँच पेंट एवं रबर उद्योगों में प्रयुक्त होता है | ललितपुर जनपद में स्थित मथुरा ग्राम के निकटवर्ती क्षेत्र बेराइट खनन के लिए जाने जाते हैं | इस खनन के विस्तार हेतु यहाँ का 1 वर्ग किमी का क्षेत्र संभावित किया गया है | 30 मीटर की लंबाई में तथा 10 – 20 सेमी की मोटाई में यह खनिज यहाँ नलिकाओं के रूप में मौजूद है | बेराइट की प्रकृति क्रिस्टलाइन है तथा इसमें 62.93% बीएओ एवं 16.9% एसओ3 पाया जाता है |
  • कोयला: भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण द्वारा सोनभद्र जनपद के दक्षिणी एवं दक्षिणी-पश्चिमी भागों में मध्यम से निम्न ग्रेड तक के लगभग 900 मिलियन टन कोयले के भंडार का आंकलन किया गया है | इसके अतिरिक्त कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा इसी क्षेत्र की अतिरिक्त खोज की गई एवं भंडार की क्षमता को अद्यतन करते हुए इसे 1050 मिलियन टन का बताया गया | मेसर्स कोल इंडिया लिमिटेड ने इस क्षेत्र की कोयला खदानों को विकसित किया एवं वर्तमान में इस क्षेत्र की चार खदानों ऊपरी पुरेवा, निचला पुरेवा , तुर्रा एवं कोटा द्वारा 16 मिलियन टन से अधिक वार्षिक कोयले का उत्पादन होता है | तुर्रा पट्टी में कोयले की सबसे मोटी तह (14 से 21 मीटर), उसके बाद निचला पुरेवा (10 से 14 मीटर), ऊपरी पुरेवा (6 से 9 मीटर) तथा कोटा (2.5 से 4.4 मीटर) पायी जाती है | तुर्रा पट्टी में सर्वश्रेष्ठ प्रकार का कोयला (ग्रेड II) पाया जाता है |

ललितपुर जनपद के सोनराई क्षेत्र में आधारभूत धात्विक अन्वेषण

ललितपुर एवं झांसी जनपदों में क्षेत्रीय भूगर्भीय सर्वेक्षण से आधारभूत सल्फाइड खनिज के बहुत से क्षेत्रों में होने का पता चला है | सोनराज ग्राम के निकटवर्ती एक क्षमता वाले क्षेत्र को अंततः विस्तृत एकीकृत सर्वेक्षण हेतु चयनित किया गया था, यह चयन यू.एन.डी.पी. द्वारा उत्तर प्रदेश में खनिज सर्वेक्षण हेतु किया गया था | विस्तृत कार्यक्रम के परिणामस्वरूप चयनित क्षेत्र के पश्चिमी भाग में 400 से 1000 मीटर की लंबाई में 1 से 3 मीटर मोटी तह सामने आयी जिसमें 0.5% से लेकर 1% ताँबा भी मौजूद था | एक अन्य खनन क्षेत्र, तोरी इलाके में 1.7% ताँबा के साथ पाया गया | पिसनारी क्षेत्र में ताँबा खनिज के साथ यूरेनियम भी पाया गया | यह क्षेत्र 300 मीटर चौड़ा है तथा यहाँ के खनिज में 0.1% से लेकर 0.9% यूरेनियम उपलब्ध है | अधिकतर खनिज भूमि की सतह से 150 से 500 मीटर की गहराई में स्थित हैं | परमाणु खनिज विभाग के द्वारा किये गए अनुवर्ती कार्यों से पता चलता है कि खनन से निरंतर वृद्धि वाले क्षेत्र नहीं बनते, ये दोहरे कानवेक्स लेंस की शक्ल में होते हैं | अर्थात लगातार खनन करते रहने से किसी खदान की वृद्धि नहीं होती क्योंकि खनिजों का जमाव लेंटीकुलर होता है |

गिरार का कम ग्रेड का लौह अयस्क

ललितपुर जनपद के बेरवा-गिरार क्षेत्र में लगभग 100 मिलियन टन का निम्न ग्रेड का लौह अयस्क भंडार मौजूद है जिसमें 25% से 30% तक लौह पाया जाता है | इन सेडिमेंट्री लौह चट्टानों को आधारभूत एवं अल्ट्राबेसिक चट्टानों द्वारा प्रतिच्छेदित किया जाता है | छिटपुट तौर पर स्वर्ण खनिजरण लौह चट्टानों में स्थित स्फटिकीय नलिकाओं या रन्ध्राकाश से जुड़ा हुआ मामला है | निम्न ग्रेड की चट्टानों को सरलता पूर्वक लाभान्वित करके उच्च कोटि का खनिज, जिसमें 67.3% लौह हो, उत्पादित किया जा सकता है |