उप खनिज

उप खनिज

उप खनिज, खदान एवं खनिज (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 1957 के अनुभाग 3 में परिभाषित किए गए हैं और अधिकतर वे खनिज हैं जो स्थानीय तौर पर उपलब्ध हैं व जिनका स्थानीय प्रयोग होता है | ये खनिज किसी बड़े उद्योग में प्रयोग नहीं किए जाते | भवन और निर्माण की अधिकतम सामग्री इसी श्रेणी में आती है | उत्तर प्रदेश में निम्न लिखित खनिज लघु खनिजों की श्रेणी में सम्मिलित किए गए हैं :-

  • चूना पत्थर (चूना जलाने हेतु)
  • संगमरमर या संगमरमर चिप्स
  • ईंट की मिट्टी
  • साल्टपीटर या पोटेशियम नाइट्रेट
  • भवन निर्माण का पत्थर
    • स्लैब या एशलर, आकारानुसार कटे आयामी पत्थर (बलुआ पत्थर, क्वार्टज़ाइट)
    • चक्की के पत्थर और जाँता (बलुआ पत्थर, क्वार्टज़ाइट)
    • खंडा और गिट्टी
      • ग्रेनाइट और डोलोस्टोन – 25*25*25 सेमी के आकार तक
      • बलुआ पत्थर और क्वार्टज़ाइट – 25*25*25 सेमी के आकार तक
    • गिट्टी
      • एक मीटर या बड़ी
      • बलुआ पत्थर क्वार्टज़ाइट
    • ग्रेनाइट निर्मित आकारानुसार कटे आयामी पत्थर
      • एक मीटर या बड़े
      • एक मीटर से छोटे
  • मूरम या लाल मिट्टी
    • नदी तल में उपलब्ध
    • पहाड़ियों के अपक्षय से उत्पन्न लाल मिट्टी
  • रेत, सामान्य रेत के अतिरिक्त, जो विशिष्ट कार्यों के लिए प्रयुक्त हो
    • प्रथम श्रेणी की रेत, जैसा कि अनुसूची में वर्णित नदियों और उनके जलागम क्षेत्र के बारे में निर्दिष्ट है
    • द्वितीय श्रेणी की रेत जो अन्य नदियों एवं उनके जलागम क्षेत्र की हो
  • कंकर
  • बजरी
  • सामान्य मिट्टी
  • अन्य कोई लघु खनिज

लघु खनिज प्रदेश के सभी जनपदों में पाए जाते हैं | पूर्व में देहरादून एवं सोनभद्र में चूना पत्थर एवं संगमरमर का खनन होता था परंतु अब ये खनन वहाँ बंद हो गया है |

ईंट की मिट्टी सभी जनपदों में, पर्वतीय जनपदों को छोडकर, पायी जाती है | प्रयोग की जाने वाली मिट्टी चिकनी और बलुई होनी चाहिए | इस तरह की मिट्टी भूमि के 2 – 6 मीटर तक के गहरे भाग को तहों में खोद कर प्राप्त की जाती है, सामान्यतया ये कृषि भूमि होती है |

भवन निर्माण पत्थर – ये पत्थर प्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित कुछ जनपदों के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं | ये जनपद हैं :-

आगरा - बलुआ पत्थर – पटिया, चौका, गिट्टी, एशलर

प्रयागराज – बलुआ पत्थर एवं क्वार्टज़ाइट – सोलिंग, गिट्टी, पटिया, चक्की, एशलर

महोबा , हमीरपुर, जालौन, झांसी – ग्रेनाइट – खंडा, गिट्टी, ब्लाक

ललितपुर – ग्रेनाइट – बलुआ पत्थर – खंडा, गिट्टी, ब्लाक, पटिया, चौका, एशलर

मथुरा – क्वार्टज़ाइट – खंडा, गिट्टी

मिर्ज़ापुर – बलुआ पत्थर – खंडा, गिट्टी, पटिया, चौका, एशलर, पत्थर निर्मित सामग्रियाँ

सोनभद्र – डोलोमाइट, ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर – खंडा, गिट्टी

चंदौली – बलुआ पत्थर – ग्नेसिस, शिस्ट, क्वार्टज़ाइट- खंडा, गिट्टी, सोलिंग, पटिया

रेत और मौरम

रेत प्रदेश की सभी नदियों में उपलब्ध है | निम्नलिखित सूची से जनपदवार नदियों के नाम व रेत भण्डार का पता चलता है | मोटी और साफ रेत, बिना परतदार खनिजों के, निर्माण के लिए उपयुक्त मानी जाती है तथा इसकी निर्माण लागत भी कम होती है | ऐसी रेत श्रेणी-1 के अंतर्गत रखी गई हैं और ये निम्नलिखित जनपदों में उपलब्ध है –

प्रथम श्रेणी की रेत :-

प्रयागराज – यमुना एवं गंगा, फिरोज़ाबाद – यमुना,गाज़ियाबाद – यमुना ,वाराणसी – गंगा एवं कर्मनाशा,गोरखपुर-घाघरा एवं दांडी , मऊ- घाघरा ,उन्नाव – गंगा एवं सई , बलिया – गंगा , मुजफ्फरनगर –गंगा एवं यमुना , अम्बेडकरनगर – घाघरा , बस्ती – घाघरा एवं कुयानों , सिद्धार्थनगर – राप्ती, गाजीपुर – गंगा, हमीरपुर – यमुना एवं बेतवा, मिर्ज़ापुर – गंगा, आगरा – यमुना एवं चंबल, भदोही – गंगा , आजमगढ़ – घाघरा एवं जामिन , कानपुर नगर एवं देहात – गंगा, इटावा – यमुना एवं चंबल, अयोध्या – घाघरा, महराजगंज – राप्ती, गोंडा – घाघरा , बहराइच – घाघरा

द्वितीय श्रेणी की रेत

बुलंदशहर – गंगा, मथुरा – यमुना, लखनऊ – गोमती, प्रतापगढ़ – गंगा एवं सई, बाराबंकी – घाघरा एवं गोमती , सुल्तानपुर – गोमती, सीतापुर – गोमती एवं सरयू , पीलीभीत – गर्रा एवं देहुआ, बदायूँ – गंगा, जौनपुर – गोमती एवं सई, हरदोई – गर्रा, गंगा एवं गोमती, शाहजहाँपुर – गर्रा, मुरादाबाद – रामगंगा, राय बरेली – गंगा एवं सई, एटा – गंगा, बरेली – रामगंगा, कानपुर देहात – यमुना, फर्रुखाबाद- गंगा एवं काली, रामपुर – रामगंगा, मैनपुरी – यमुना, अलीगढ़ – गंगा, मेरठ- यमुना, देवरिया – छोटी गंडक एवं घाघरा

मौरम झाँसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, फ़तेहपुर, बांदा एवं सोनभद्र से होकर बहने वाली नदियों से प्राप्त होता है | अधिकतम मूरम ग्रेनाइट चट्टानों के अपक्षय एवं विघटन से प्राप्त होता है | एक अन्य प्रकार का मौरम, जो “लाल मौरम” कहलाता है, वास्तव में लेटराइट मिट्टी है जो ऊंचे धरातलीय भागों की सतह पर पायी जाती है, यह काफी पुराने चट्टानीय अपक्षय से बनी होती है | इन मिट्टियों का प्रयोग कच्ची सड़कों पर बिछाने के लिए किया जाता है |

कंकड़ प्रदेश के मध्यवर्ती एवं पूर्वी जनपदों में धरातल से 1 से 3 मीटर की गहराई पर पाया जाता है | इसका पिछले समय में बहुत अधिक दोहन हुआ है और यह नहरों के निर्माण, सड़कों के निर्माण, चूना बनाने में किया जाता था, परंतु इसका खनन पिछले 10-15 वर्षों से बंद है |

साल्टपीटर या शोरा, जिसे स्थानीय तौर पर “लोना” कहा जाता है, भूमि के साथ एक मिश्रित मात्रा में केन्द्रीय जनपदों उन्नाव, कानपुर देहात, एटा, मैनपुरी, फ़र्रूखाबाद, आगरा मथुरा, अलीगढ़, इटावा इत्यादि के पुराने क्षेत्रों में पाया जाता है | यहाँ के लोनिया समुदाय के लोग सालपेटर से कच्चा नाइटर/कलमी शोरा बनाते हैं, यद्यपि ये गतिविधि अब आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है |

रेह सामान्य तौर पर केंद्रीय जनपदों में मिलती है | यह अधिकतर उन शुष्क क्षेत्रों में मिलती है जहां अच्छी जलनिकासी नहीं है, पानी सदैव मृदा पर एकत्रित रहता है और एकत्र हुआ नमक फूल कर भूमि की सतह पर आ जाता है | यह देसी काँच बनाने, साल्टपीटर बनाने, त्वचा विकार विरोधी औषधियाँ बनाने , चमड़े को रंगने, साबुन बनाने तथा कपड़ों को रंगने एवं धोने के काम आता है | यह स्थानीय तंबाकू निर्माताओं द्वारा तंबाकू के साथ गूँथ कर उसे नई रंगत देने व तैयार उत्पाद की निरंतरता बनाए रखने के काम भी आता है |

रेत व ईंट की मिट्टी का प्रयोग भवन और निर्मांण कार्यों में होता है |

बजरी एवं गिट्टी : बिजनौर,  लखीमपुर, बहराइच, श्रावस्ती एवं बलरामपुर जनपदों की नदियों में रेत के साथ मिलती है |